सफर गाँव का
गांव जहां की मिट्टी में एक अलग ही खुशबू होती है| वहां के लोग पहनावा उनकी धारणा , उनकी परंपराएं , जिंदगी को जीने का अंदाज़ सब कुछ अलग सा होता है | मैं भी गांव से परिचित हूं, मैंने बचपन का कुछ समय गांव में बिताया है |उन्हीं में से कुछ यादों को मैं लिख रहा हूं| हमारा गांव फैजाबाद के नजदीक एक जगह है जिसका नाम" गैनी " है। जहां जाने के लिए आज भी सिर्फ एक ही बस चलती है| उसका भी समय निश्चित है मुझे याद है कि जब हम जाया करते थे तब उस बस का आना हमारे लिए ऐसी खुशी लाता था कि मानो जैसे हमने कितनी बड़ी जीत हासिल की और उस पर सोने पर सुहागा तो तब था जब हमें उस बस में बैठने को मिल जाता था।
गांव में मेरी नाना- नानी, मामा- मामी और उनके तीन बच्चे रहते थे | वहां मिट्टी के कच्चे घर हरियाली और एक प्यारी सी गाय थी जैसे ही हम वहां पहुंचते नानी कहती थी कि आज ही कौवा बोला था| हमें लगा था कि तुम सब आओ गाँव में कौवा जब अटारी में बोल दे तो समझ लो कि कोई आने वाला है ऐसा नानी कहती थी क्योंकि उस समय टेलीफोन नहीं होते थे | हम सब गर्मियों की छुट्टियां वही बताया करते थे हमारे पहुंचते ही नानी बरात में पानी लेकर आती थी और सब के पेड़ होती थी।
जब नाना खेतों में जाया करते थे तो हम भी उनके साथ जाते हमने वहां सीखा कि कैसे फसलों को बड़ा करने के लिए भी उनका ख्याल रखना पड़ता है| उन्हें कब कितना पानी देना है, कीटनाशक कब डालना है ,कौन सी खाद देनी है इन सब बातों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है| खेती के लिए नाना बहुत सारे सब्जियां उगाते थे जैसे आलू, मटर, बैंगन और दालें, तिलहन, चावल गेहूं | किस तरह हर एक फसल का ख्याल रखा जाता है वह भली भांति जानते थे | नानी छोटी सी खटिया लेकर नाना के साथ खेत में बैठकर और उनका हाथ बांटाती थी| हम भी जब जाते थे तो नाना एक-एक पौधा दिखा कर हमें यह बताया करते थे | मैंने भी खेतों में आलू, भिंडी, मटर, मिर्च पर सब की फसलें देखी है | सबसे अच्छी बात यह कि जिस की भी सब्जी बनी होती थी वह सब्जी तुरंत तोड़कर खेत से लाई जाती थी शुद्ध सुरक्षित चीजें खाने को मिलती थी जिनमें कोई मिलावट नहीं होती थी| नाना के गांव में गन्ना बहुत होता है तो हमने गन्ने के ताजे रस का भी अनुभव किया| वह भी कोल्हू से निकला हुआ जिसे पीकर ठंडक मिलती थी| हमारे यहां हल भी थे जिससे खेतों को जोता जाता था। गांव में लोगों के यहां बैल भी पाले जाते थे जिनसे हम जोतने में सहायता होती थी क्योंकि तब ट्रैक्टर का चलन इतना नहीं था | उस समय गांव में एक या दो के पास ही ट्रैक्टर होता था| गांव की जिंदगी बड़ी सादगी वाली होती है वहां के लोगों में कोई दिखावा नहीं होता जो है उसमें खुश रहना उन लोगों से सीखे| मेहनत करके दो वक्त के खाने के लिए दिन भर काम करना फिर भी मुस्कुराते हुए जिंदगी जीना ,हर सुख सुविधा के अभाव में बिना टेक्नोलॉजी के भी जिंदादिली से जीना सबको आदर सम्मान देना जिंदगी को कैसे जिए वह कोई उनसे सीखे।